बिहार के गया में लगता है मौत के बाद मुक्ति का मेला, क्यों खास है यह पौराणिक परंपरा

बिहार के गया में लगने वाला यह मेला पिंडदान और मोक्ष की मान्यताओं से जुड़ा है, जहां देशभर से लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पहुंचते हैं।

मृत्यु के बाद आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से जुड़ी परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा हैं। बिहार के गया में लगने वाला मुक्ति का मेला इसी आस्था का जीवंत उदाहरण है। मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि हर साल इस मेले के दौरान देश-विदेश से हजारों लोग अपने पूर्वजों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए गया पहुंचते हैं, जिससे यह स्थान आध्यात्मिक आस्था का बड़ा केंद्र बन गया है।

अगर अमिताभ बच्चन अभिनित फिल्म भूतनाथ आपने देखी हो तो पिंडदान का महत्व समझ सकते हैं।  इस मेले में दुनिया भर से करीब 10 से 15 लाख लोग पहुंचने वाले हैं। मेले की तैयारी प्रशासन और सामाजिक स्तर पर जोर शोर से की गई है। पूर्वजों को मोक्ष दिलाने यानि उनके लिए पिंडदान करने के लिए गया में 360 प्लेटफार्म है। पिंडदान का यज्ञ जौ के आटे में सूखे दूध मिला कर या कीचड़ की गेंद से किया जाता है।

देखरेख की लापरवाहियों की वजह से इस बार गया के 5 जगहों पर केवल 48 प्लेटफार्म ही ऐसे हैं जहां पिंडदान किया जा सकेगा। बिहार की राजधानी पटना से 104 किलोमीटर दूर स्थित गया देश भर में एकमात्र ऐसा स्थान है जहां मोक्ष में यकीन करने वाले लोग आते हैं और पूर्वजों के लिए पिंडदान करते हैं। अब ये सुविधा विभिन्न पैकेजों के साथ आनलाइन भी उपलब्ध है मगर लोग यहां पहुंचकर ही पिंडदान करना चाहते हैं। हर साल पितृपक्ष में लगने वाले 18 दिन के इस मेले का सबसे खास पहलू यहां के पंडा हैं मोक्ष के मेले में मोक्ष का यज्ञ इन पंडों के बिना पूरा नहीं हो सकता। यहां के पंडो के पास किसी वंश के बारे में कई चौकाने वाले तथ्य मौजूद होते हैं अपने बही खाते में ये सबके वंशजों के सैकड़ो साल का हिसाब किताब रखते हैं।

मोक्षधाम के रुप में गया पूरे विश्व में विख्यात है। गयापाल पंडा बैधनाथ चौधरी, रंजन पंडा सहित अन्य बताते हैं कि गया का नाम राक्षस गयासुर के नाम पर रखा गया है। गया में ही गया सुर को भगवान विष्णु ने उसकी छाती को अपने पैरों से दबाकर मारा था। तभी से विष्णु के पैरों के निशान हैं जिसे विष्णुपाद मंदिर का नाम दे दिया गया है। पिंडदान इन्हीं पैरों को समर्पित किया जाता है। गया के पंडा समाज के लोग आज भी अपनी जीवका चलाने के लिए देश विदेश से आये तीर्थ यात्री को गया में पिंड दान करा कर अपने जीवन यापन कर रहे हैं। यहाँ पर सालों भर तीर्थयात्री अपने पितरों का पिंडदान व तर्पण करने आते हैं।

ऐतिहासिक रूप से गया प्राचीन मगध साम्राज्य का हिस्सा था। गया सिर्फ हिंदुओं का ही नहीं वरण बौद्धों का भी पवित्र स्थान है। गया में कई बौद्ध तीर्थ स्थान हैं। गया के ये पवित्र स्थान प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं, जिनमें से अधिकांश भौतिक सुविधाओं के अनुरूप है। फल्गु नदी के तट एवं इस पर स्थित मंदिर सुन्दर एवं आकर्षक हैं। फल्गु नदी के तट पर स्थित पीपल का वृक्ष जिसे अक्षयवट कहते हैं, हिंदुओं के लिए पवित्र है। यह वृक्ष अपनी दिव्यता की वजह से पूजा जाता है। मंगला गौरी मंदिर में भगवान शिव की प्रथम पत्नी के रूप में मान्य सती देवी की पूजा की जाती है। यहाँ स्थित दो गोल पत्थरों को पौराणिक देवी सती के स्तनों का प्रतीक मानकर हिंदुओं के बीच पवित्र माना जाता है।

गया तीर्थ के बारे में गरूड़ पुराण और वायु पुराण में भी कहा गया है। गया तीर्थ के बारे में गरूड़ पुराण यह भी कहता है कि यहां पिण्डदान करने मात्र से व्यक्ति की सात पीढ़ी और एक सौ कुल का उद्धार हो जाता है। गया तीर्थ के महत्व को भगवान राम ने भी स्वीकार किया है। वाल्मिकी रामायण में सीता द्वारा पिंडदान देकर दशरथ की आत्मा को मोक्ष मिलने का संदर्भ आता है। वनवास के दौरान भगवान राम लक्ष्मण और सीता पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध करने के लिए गया धाम पहुंचे। वहां श्राद्ध कर्म के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने हेतु राम और लक्ष्मण नगर की ओर चल दिए। उधर दोपहर हो गई थी। पिंडदान का समय निकलता जा रहा था और सीता जी की व्यग्रता बढती जा रही थी। अपराहन में तभी दशरथ की आत्मा ने पिंडदान की मांग कर दी। गया जी के आगे फल्गू नदी पर अकेली सीता जी असमंजस में पड गई। उन्होंने फल्गू नदी के साथ वटवृक्ष केतकी के फूल और गाय को साक्षी मानकर बालू का पिंड बनाकर स्वर्गीय राजा दशरथ के निमित्त पिंडदान दे दिया।

थोडी देर में भगवान राम और लक्ष्मण लौटे तो उन्होंने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया। बिना सामग्री के पिंडदान कैसे हो सकता है, इसके लिए राम ने सीता से प्रमाण मांगा। तब सीता जी ने कहा कि यह फल्गू नदी की रेत केतकी के फूल, गाय और वटवृक्ष मेरे द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं। इतने में फल्गू नदी, गाय और केतकी के फूल तीनों इस बात से मुकर गए। सिर्फ वटवृक्ष ने सही बात कही। तब सीता जी ने दशरथ का ध्यान करके उनसे ही गवाही देने की प्रार्थना की।

दशरथ जी ने सीता जी की प्रार्थना स्वीकार कर घोषणा की कि ऐन वक्त पर सीता ने ही मुझे पिंडदान दिया। इस पर राम आश्वस्त हुए लेकिन तीनों गवाहों द्वारा झूठ बोलने पर सीता जी ने उनको क्रोधित होकर श्राप दिया कि फल्गू नदी- जा तू सिर्फ नाम की नदी रहेगी, तुझमें पानी नहीं रहेगा। इस कारण फल्गू नदी आज भी गया में सूखी रहती है। गाय को श्राप दिया कि तू पूज्य होकर भी लोगों का जूठा खाएगी। और केतकी के फूल को श्राप दिया कि तुझे पूजा में कभी नहीं चढाया जाएगा। वटवृक्ष को सीता जी का आर्शीवाद मिला कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री तेरा स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेगी। यही कारण है कि गाय को आज भी जूठा खाना पडता है, केतकी के फूल को पूजा पाठ में वर्जित रखा गया है और फल्गू नदी के तट पर सीताकुंड में पानी के अभाव में आज भी सिर्फ बालू या रेत से पिंडदान दिया जाता है।

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Alok Verma
a senior journalist with a 30 years experience of print, electronics and digital. worked with dainik jagran, news18india, R,bharat, zee news

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20-10-2026