सत्य अपराध कथा-जब कत्ल की वजह बन गई पूछताछ

पुलिस में काम करने वाले उस हवलदार को सतर्क रहने की आदत सी थी। उसका नाम फिलहाल राम प्रसाद रख लेते हैं।  जागरूक नागरिक और पुलिस में काम करने की वजह से उसे संदिग्ध लोगों से पूछताछ करने की आदत भी थी। एक दिन वह डयूटी समाप्त कर घर लौटा। वर्दी उतारने के बाद उसे पता लगा कि चक्की पर गेहूं पीसने के लिए गया हुआ है। वह घर से स्कूटर पर आटा लाने के लिए चल पड़ा। धीरे-दीरे रात होती गई मगर राम प्रसाद का कुछ अत्ता पता नहीं था। एकाएक अस्पताल से राम प्रसाद के घर फोन आया। इस फोन ने ना केवल राम प्रसाद बल्कि पूरे पुलिस विभाग में हड़कंप मचा दिया था।  

हड़कंप मचे भी क्यों ना सूचना थी कि राम प्रसाद को किसी ने गोली मार दी और उसकी मौत हो चुकी है। देखते ही देखते ये खबर पुलिस के आला अधिकारियों तक पहुंच चुकी थी। आतंकी घटना से लेकर तमाम कयास लगाए जाने लगे।      

दिल्ली की इस घटना ने कई सबक दिए। इस मामले की कड़ी ने आम नागरिक को जाकरूकता के साथ-साथ सतर्क और सावधान रहने की सबक दी तो पुलिस को मामले सुलझाने में हर छोटी कड़ी की अहमियत समझने की।

क्राइम को सुलझाने के दो तरीके होते हैं पहला क्राइम से क्रिमिनल तक पहुंचा जाए औऱ दूसरा क्रिमनल से क्राइम तक। किसी सनसीनखेज मामले में पहले तरीके यानि क्राइम से क्रिमिनल तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि मौके पर कोई ठोस सुराग मिले। मगर राम प्रसाद के मामले में ऐसा कुछ हाथ नहीं लग रहा था।   

पुलिस ने तमाम स्केच बनवाए और सैकड़ो लोगों से पूछताछ की। मगर हवलदार राम प्रसाद की हत्या का कोई सुराग हाथ नहीं आया। पुलिस को एक गवाह जरूर मिला लेकिन उससे भी काम की कोई बात नहीं निकली ना ही वह सीसीटीवी फुटेज काम आया जो पुलिस को स्थानीय लोगों ने दी थी। देखते देखते महीना दर महीना गुजरता गया आखिरकार इस मामले को सुलझाने के लिए तेज तर्रार अफसरों की टीम बनाई गई। मामले के सुलझने पर इनाम भी रखा गया। इस नई पुलिस टीम ने नए सिरे से जांच शुरू की और वाहन चोरों पर जांच को केंद्रीत किया गया। पुलिस ने मामले की तह तक पहुंचने के लिए कई बार क्राइम सीन को रिक्रिएट किया और कई बार तरह-तरह की वेश भूषा भी धरी। खासकर दोपहिया वाहन चोरों की जांच शुरू हुई। पता लगा कि एक खास इलाके के कुछ कुछ गिरोह दोपहिया वाहन की चोरी करने निकलते हैं। सीसीटीवी की जांच में पुलिस को मोटरसाइकल की ब्रांड और तीन सवारों में से एक की शर्ट का रंग पता लग गया था। जांच पड़ताल में तीन संदिग्ध फोन नंबर भी पुलिस को मिले थे और पता लगा था इनमें से एक नंबर कत्ल की रात राम प्रसाद के इलाके में था। पुलिस को अब धीरे-धीरे कत्ल की कड़ी मिलने लगी । संदिग्धों के खिलाफ सबूत जुटाए जाने लगे। राम प्रसाद के कातिल के रूप में पुलिस को दो लोग मिल गए थे।

लेकिन कत्ल की वजह साफ नही थी। पूछताछ करने पर पता लगा कि राम प्रसाद ने संदिग्ध हालत में खड़े इन लोगों से गहन पूछताछ शुरू कर दी थी और एक को थप्पड़ भी जड़ दिया था। इसी से नाराज होकर आरोपियों ने राम प्रसाद को गोली मार दी थी। सतर्क पुलिसमैन और जागरूक नागरिक बनने की भूमिका अदा करने में राम प्रसाद की जान चली गई मगर उसके घरवालों को संतोष था। उसके कातिलों तक पहुंचने के बाद पुलिस भी संतुष्ट थी और राम प्रसाद के कत्ल के समय सत्य-असत्य खबरों का जो बवंडर मचा था उस पर भी विराम लग चुका था। अगर पुलिस की विशेष टीम ना बनी होती ना ही नई टीम ने उस तरफ ध्यान दिया होता तो शायद राम प्रसाद के कातिल जेल ना पहुंचते।

दिल्ली में हुई सच्ची घटना पर आधारित(पात्र और कुछ तथ्य बदल दिए गए हैं ताकि पठनीय बन सके)

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