यह आयोजन साहित्य का था, लेकिन सवाल रोजगार, पहचान और बिहार के कल से जुड़े थे।आमतौर पर साहित्य की बात मंच तक सीमित रहती है। लेकिन पटना में हुआ यह आयोजन कुछ और ही कर गया।
यहां कविता के बीच विकास पर सवाल उठे, संस्कृति की चर्चा में रोजगार की चिंता दिखी,और किताबों के पन्नों से निकलकर बिहार का भविष्य बहस का विषय बन गया। बात हो रही है लेट्स इंस्पायर साहित्य महोत्सव की।
लेट्स इंस्पायर बिहार साहित्य महोत्सव क्यों था अलग
पटना के विद्यापति भवन में आयोजित लेट्स इंस्पायर बिहार प्रथम साहित्य महोत्सव किसी पारंपरिक साहित्यिक सम्मेलन जैसा नहीं था। इसे लेट्स इंस्पायर बिहार ने द लिटरेरी मिरर के सहयोग से आयोजित किया, लेकिन एजेंडा सिर्फ साहित्य नहीं था।
यहां सवाल यह नहीं था कि कौन-सी किताब बेहतर है, बल्कि यह था कि साहित्य बिहार को आगे कैसे ले जा सकता है। लेखक, कवि, प्रशासक, शिक्षाविद् और युवा एक मंच पर थे और बातचीत समाज, पहचान, असमानता और संभावनाओं पर हो रही थी।
मंच से सीधे विकास की बात
उद्घाटन सत्र में लेट्स इंस्पायर बिहार के संरक्षक विकास वैभव, आईपीएस ने ऐसा संबोधन दिया जिसने श्रोताओं को सहज ही सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि बिहार की आर्थिक चुनौतियां वास्तविक हैं, लेकिन उससे भी बड़ी सच्चाई यह है कि बिहार के पास देश की सबसे युवा आबादी है।
उनका तर्क सीधा था।अगर युवाओं की ऊर्जा, उद्यमिता और रचनात्मक सोच को सही दिशा मिले, तो बिहार सिर्फ बराबरी नहीं करेगा, बल्कि नेतृत्व भी कर सकता है। उन्होंने नालंदा और विक्रमशिला की परंपरा का जिक्र करते हुए यह भी याद दिलाया कि यह भूमि कभी वैश्विक ज्ञान का केंद्र थी।
भावनाओं तक सीमित नहीं साहित्य
कार्यक्रम में मौजूद कई वक्ताओं ने एक बात बार-बार दोहराई। साहित्य सिर्फ संवेदना नहीं, जिम्मेदारी भी है। इसी संदर्भ में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और लेखक अमित लोढ़ा और लेखक-राजनेता मृत्युंजय शर्मा के बीच हुआ संवाद सबसे ज्यादा चर्चा में रहा।
बात पुलिस सेवा से शुरू हुई, लेकिन जल्द ही यह सवाल सामने आया कि संस्थाएं अधिक मानवीय कैसे बनें और साहित्य इसमें क्या भूमिका निभा सकता है। यह सत्र इसलिए प्रभावी रहा क्योंकि यहां न तो भाषण था, न उपदेश। बस अनुभव थे, ईमानदार जवाब थे और श्रोता जुड़े हुए थे।
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कविता, मंच और बिहार की असली तस्वीर
लेट्स इंस्पायर बिहार साहित्य महोत्सव का अंतिम बड़ा सत्र कविता और मंच प्रस्तुति पर केंद्रित रहा।
यहां शब्द सिर्फ सौंदर्य नहीं रच रहे थे, वे बेरोजगारी, पलायन, पहचान और उम्मीद की कहानियां कह रहे थे।
कविता और प्रस्तुति ने यह साफ कर दिया कि बिहार की सांस्कृतिक चेतना आज भी जीवित है, बस उसे सुनने वाला मंच चाहिए।
मंत्री का संदेश: संस्कृति बिना समाज अधूरी
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बिहार सरकार के मंत्री अरुण शंकर प्रसाद ने कहा कि ऐसे आयोजन राज्य की सांस्कृतिक आत्मा को मजबूत करते हैं।
उन्होंने साहित्य को समाज का दर्पण बताया और पारंपरिक कलाओं के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया।
उनका संदेश साफ था। सरकारी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन समाज को जोड़ने का काम ऐसे मंच ही करते हैं।









