environmental news: पर्यावरण संतुलन के लिए जैव विविधता का संरक्षण कितना आवश्यक है इसे कौन नहीं जानता। जैव विविधता को बचाने में पारंपरिक ज्ञान ठोस मददगार साबित हो सकता है। इन दोनों के संरक्षण के लिए अगर राज्य भर के शिक्षक खास अभियान से जुड़ जाएं तो फिर ठोस परिणा आने लगभग तय है। संभवतः इसी सच्चाई को झारखंड में समझ लिया गया है। इसीलिए झारखंड जैव विविधता परिषद (jharkhand biodiversity board) ने खास अभियान शुरू किया है।
environmental news: शिक्षक संग मिलकर चलेगा अभियान
जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान संरक्षण के लिए झारखंड जैव विविधता पर्षद के सह सदस्य सचिव IFS, PCCF संजीव कुमार की अध्यक्षता में राज्य के विभिन्न भाषाओं के शिक्षकों के साथ विशेष बैठक का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य पर्षद के साथ मिलकर जनजातीय आदिवासियों को उनकी भाषा में जैव विविधता के लिए जागरूक करना है। जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान दोनो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं।

पारंपरिक ज्ञान
स्वदेशी और स्थानीय समुदायों का पारंपरिक ज्ञान जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग के लिए आवश्यक है। गौरतलब है कि स्थानीय समुदायों के पास प्राकृतिक संपदा के बारे में गहरा ज्ञान होता है। आईएफएस संजीव कुमार ने अपने कार्यकाल में कई बार इस पारंपरिक ज्ञान के उपयोग पर खास जोर दिया हैय़ वृक्षारोपण अभियान में भी वह इस नजरिए का खास ख्याल रखते थे।

श्री संजीव कुमार, IFS, PCCF -सह -सदस्य सचिव के अध्यक्षता में राज्य के विभिन्न भाषाओं के शिक्षकों के साथ राज्य के विभिन्न भाषाओं को जैव विविधता के साथ -साथ जनजातियों की भाषा एवं पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के उद्वेश्य एवं पर्षद के साथ मिलकर जनजातीय आदिवासियों को उनकी भाषा में जैव विविधता के जागरूकता लाने हेतु बैठक की गई एवं पूरे राज्य के भाषाओं को संरक्षित के साथ उनका उपयोग किया जाना सदस्य सचिव ने शिक्षाविदों से आग्रह किए। बैठक में विद्या सागर यादव – पांचपरगनीया, डॉ. अरविंद कुमार – खोरठा, डॉ. सीता कुमारी एवं डॉ. बन्दे खलखो – कुडूख, बिनाधर सांडिल एवं करम सिंह मुंडा – मुंडारी, शकुंतला बेसरा – संथाली, नन्हकिशोर रजक एवं युवराज कुमार – नागपुरी, डॉ. सरस्वती गर्ग एवं डॉ. जय किशोर मंगल – हो के विशेषज्ञ उपस्थिति थे |
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