एक कॉल, एक डर, और जीवनभर की बचत दांव पर: वरिष्ठ नागरिक साइबर ठगों के सबसे आसान शिकार क्यों बन रहे हैं?

एक फोन कॉल कैसे जीवनभर की बचत और गरिमा दोनों छीन लेता है? वरिष्ठ नागरिकों पर बढ़ते साइबर हमलों की सच्ची कहानियां और उनसे बचने का रास्ता।
वरिष्ठ नागरिक साइबर अपराध जागरूकता और डिजिटल सुरक्षा
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फोन की घंटी बजती है। दूसरी ओर कोई खुद को CBI अधिकारी बताता है। आवाज़ सख्त है, लहजा डराने वाला। कुछ ही मिनटों में भरोसा टूटता है, डर हावी होता है और जीवनभर की जमा-पूंजी खतरे में पड़ जाती है।
सवाल यह नहीं है कि वरिष्ठ नागरिक साइबर अपराध के शिकार क्यों हैं, असली सवाल यह है कि हम अब तक उन्हें सुरक्षित क्यों नहीं बना पाए

क्यों वरिष्ठ नागरिक साइबर अपराधियों के लिए आसान निशाना हैं?

साइबर अपराध अब तकनीक का खेल कम और मानव मनोविज्ञान का खेल ज्यादा बन चुका है। ठग वही जगह वार करते हैं, जहां प्रतिरोध सबसे कमजोर होता है। बस यही राज है जो वरिष्ठ नागरिक साइबर अपराध का शिकार बन जाता है।

भावनात्मक शोषण
अकेलापन, डर और “सरकारी आदेश” का दबाव—इन तीनों का इस्तेमाल कर बुज़ुर्गों को सोचने का मौका तक नहीं दिया जाता।

वित्तीय जोखिम
जीवनभर की कमाई अक्सर एफडी, पेंशन या बचत खातों में होती है। यही ठगों का सबसे बड़ा लालच है।

सीमित डिजिटल साक्षरता
OTP, वीडियो कॉल, रिमोट एक्सेस—ये शब्द कई बुज़ुर्गों के लिए आज भी अनजाने हैं, और ठग इसी अज्ञानता को हथियार बनाते हैं।

हाल के साइबर अपराध मामले जो चेतावनी देते हैं

अहमदाबाद “ब्लैक ब्लड” ट्रैप
ठगों ने “डिजिटल अरेस्ट” का नाटक किया और बुज़ुर्ग को एफडी तुड़वाने पर मजबूर किया। एक सतर्क बैंक मैनेजर ने समय रहते पुलिस को सूचना दी और बड़ा नुकसान टल गया।
सबक: बैंक की चौकसी जान बचा सकती है।

₹58 करोड़ डिजिटल अरेस्ट घोटाला, महाराष्ट्र
नकली CBI-ED अधिकारी, फर्जी वीडियो कॉल और अदालत का डर। 40 दिनों में 27 ट्रांजैक्शन।
परिणाम: भारत के सबसे बड़े व्यक्तिगत साइबर धोखों में से एक।

82 वर्षीय पूर्व सैनिक से करोड़ों की ठगी
सुप्रीम कोर्ट के नकली पत्र और अफसरों की भूमिका निभाकर दबाव बनाया गया।
यह सिर्फ आर्थिक नहीं, मानसिक टूटन की कहानी भी है।

सेवानिवृत्त कर्नल का रोमांस स्कैम
ऑनलाइन रिश्तों की आड़ में भावनात्मक शोषण और ब्लैकमेल।
साइबर अपराध अब दिल से होकर बैंक तक पहुंचता है।

यह भी पढ़ेंः वरिष्ठ नागरिक निवेश धोखाधड़ी का नया खतरा: वेल्थ मैनेजमेंट के नाम पर करोड़ों गंवाने की बढ़ती घटनाएँ

मुंबई आउटरीच मॉडल
साइबर सेल अधिकारी बुज़ुर्गों के घर जाकर साइबर स्वच्छता सिखाते हैं।
डर कम हुआ, भरोसा लौटा—और ठगी रुकी।

मुख्य सबक जो हर परिवार को जानना चाहिए

  • डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई चीज़ नहीं होती।
  • कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती।
  • डर पैदा किया जाए, तो समझिए ठगी शुरू हो चुकी है।

समाधान क्या है? सिर्फ सलाह नहीं, संगठित राष्ट्रीय पहल

यह समस्या पोस्टर या व्हाट्सऐप फॉरवर्ड से हल नहीं होगी।

बीट-स्तर साइबर अधिकारी
हर पुलिस बीट पर एक प्रशिक्षित अधिकारी, जो बुज़ुर्गों की पहली मदद बने।

घर-घर जाकर प्रशिक्षण
मुंबई मॉडल को पूरे देश में लागू किया जाए—व्यक्तिगत संवाद सबसे प्रभावी है।

बैंक साझेदारी
हर बैंक में सक्रिय नोडल अधिकारी, जो संदिग्ध लेन-देन पर तुरंत हस्तक्षेप करे।

भावनात्मक सहयोग नेटवर्क
तकनीकी प्रशिक्षण के साथ-साथ मानसिक भरोसा भी दिया जाए, ताकि डर ठगों का हथियार न बने।

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22-01-2026