आपदा मित्र की सख्त है जरूरत, गृह मंत्री अमित शाह ने बताई अहमियत

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आपदा मित्र की जरूरत कितनी है यह बताते हुए गृह मंत्री अमित शाह फोटो पीआईबी

आपदा मित्रों की जरूरत गांव-गांव में है। अगर कुछ ही पलो में आपदा के समय तुरंत कार्रवाई करनी है तो देश की जनता, समाज और गांव गांव में प्रशिक्षित आपदा मित्र ही कर सकते हैं। आपदा मित्र अच्छा कांसेप्ट है। गृह मंत्री अमित शाह ने आपदा मित्रों की जरूरत औऱ इसकी अहमियत के बारे में विस्तार से बताया।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि आपदा मित्र के सहयोग से जनता को तैयार करना और जिन लोगों में आपदा के ख़िलाफ़ लड़ने, दूसरों के लिए काम करने और अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को बचाने का जज़्बा है, ऐसे लोगों को एकत्रित करके उनका स्किल अपग्रेडेशन करना चाहिए। उन्हें सारे प्रोटोकॉल से अवगत कराने और आपदा आने पर तुरंत कार्रवाई करने की  व्यवस्था की जा सकती है। उन्होंने कहा कि आपदा मित्र का क्रियान्वयन 25 राज्यों के 30 बाढ़ग्रस्त ज़िलों में प्रयोगात्मक रूप में किया गया है। 5500 आपदा मित्रों और आपदा सखियों को बाढ़ से बचाव के लिए तैयार करने का काम किया गया है। जिन्हें तैराकी आती है, उनका इसके लिए चयन किया गया और जहां भी बाढ़ आई, इन्होंने बहुत अच्छा काम किया। अमित शाह ने आपदा मित्रों को सरकार और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की ओर से बधाई दी।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह नई दिल्ली में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के 17 वें स्थापना दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। इस साल के स्थापना दिवस का विषय (Theme) ‘हिमालयी क्षेत्र में आपदा घटनाओं का सोपानन प्रभाव’ है। इस अवसर पर अमित शाह ने आपदा मित्र योजना की प्रशिक्षण नियमावली और आपदा मित्र व सामान्य चेतावनी प्रोटोकॉल (Common Alerting Protocol) के योजना दस्तावेज का विमोचन किया। समारोह में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय,  अजय कुमार मिश्रा और निशिथ प्रामाणिक, केंद्रीय गृह सचिव, एनडीएमए के सदस्य व अधिकारी, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल के महानिदेशेक (एनडीआरएफ़) और केंद्रीय गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ-साथ देशभर से आपदा प्रबंधन से जुड़े लोग वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए।

अपने सम्बोधन में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि एनडीएमए और इसकी क्रियान्वयन ऐजेंसी के रूप में राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (एनडीआरएफ़) और राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ़) ने पिछले 17 वर्षों में देश के आपदा प्रबंधन के इतिहास को बदलने और पूरे देश की संवेदनशीलता को आपदा प्रबंधन के साथ जोड़ने का काम किया है और ये बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि 130 करोड़ लोगों के देश में, जहां हर राज्य में अलग-अलग मौसम, कई नदियां, पहाड़, लंबे समुद्री तट हैं, इस स्थिति में अगर हम जनता और समाज की संवेदनशीलता, आपदाओं से बचने के लिए वैज्ञानिक व्यवस्थाओं का सूत्रपात और इन व्यवस्थाओं को नीचे तक स्वीकारने की मानसिकता तैयार नहीं कर पाते हैं तो हमें बहुत बड़ी जानहानि और आधारभूत ढांचे की हानि की तैयारी रखनी होगी। लेकिन इन 17 वर्षों में इस क्षेत्र में काफ़ी परिवर्तन आया है। अमित शाह ने एनडीएमए द्वारा शुरू की गईं दो नई पहल – आपदा मित्र और कॉमन अलर्ट प्रोटोकॉल – के बारे में कहा कि आपदा मित्र योजना बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि एनडीएमए को दुनियाभर में आपदा के जोखिम को न्यूनतम करने के लिए हुए शोध या गुड प्रैक्टिस की स्टडी करनी  चाहिए और उन्हें हमारे देश की परिस्थितियों तथा चुनौतियों के अनुसार परिवर्तित कर एक कार्यपद्धति में ढालकर लोगों तक ले जाना। श्री शाह ने कहा कि कई प्रयासों और सरकार द्वारा बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद आपदा आते ही एनडीएमए, एनडीआरएफ़ और एसडीआरएफ़ जैसी ऐजेंसियों द्वारा तुरंत कार्रवाई कर पाना मुश्किल है। उन्होने कहा कि कितनी भी व्यवस्था करने के बावजूद इतने बड़े देश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचने में कुछ समय लगना स्वाभाविक है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि आपदा मित्र के सहयोग से जनता को तैयार करना और जिन लोगों में आपदा के ख़िलाफ़ लड़ने, दूसरों के लिए काम करने और अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को बचाने का जज़्बा है, ऐसे लोगों को एकत्रित करके उनका स्किल अपग्रेडेशन करना चाहिए। उन्हें सारे प्रोटोकॉल से अवगत कराने और आपदा आने पर तुरंत कार्रवाई करने की  व्यवस्था की जा सकती है। उन्होंने कहा कि आपदा मित्र का क्रियान्वयन 25 राज्यों के 30 बाढ़ग्रस्त ज़िलों में प्रयोगात्मक रूप में किया गया है। 5500 आपदा मित्रों और आपदा सखियों को बाढ़ से बचाव के लिए तैयार करने का काम किया गया है। जिन्हें तैराकी आती है, उनका इसके लिए चयन किया गया और जहां भी बाढ़ आई, इन्होंने बहुत अच्छा काम किया।  अमित शाह ने आपदा मित्रों को सरकार और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की ओर से बधाई दी।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि ये प्रयोग अभी बहुत छोटे स्तर पर हुआ है और 130 करोड़ की आबादी वाले देश में 5500 आपदा मित्र और आपदा सखी बहुत छोटी संख्या है। इससे पूरे देश को कवर नहीं किया जा सकता, इसीलिए 350 आपदा प्रभावित ज़िलों में हम आपदा मित्र योजना को लागू करने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले 17 वर्षों में कई प्रोटोकॉल और एसओपी बनाए गए हैं इन्हें ज़मीन पर उतारने और आपदा के समय तुरंत कार्रवाई करने के लिए 350 ज़िलों में इस व्यवस्था को लागू किया जाएगा। श्री शाह ने कहा कि इन सभी वॉलंटियर्स और उनके परिवार के मन में आश्वस्तता का भाव पैदा करने के लिए भारत सरकार ने उनका बीमा करने का बहुत बड़ा निर्णय भी लिया है। 28 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने इस योजना के लिए एनडीएमए के साथ एमओयू (MoU) किया है।

अमित शाह ने कहा कि कॉमन अलर्ट प्रोटोकॉल का अच्छी तरह से प्रचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एनडीएमए ने कई बहुत अच्छी पहल की हैं जिसके के अंतर्गत बिजली गिरने के स्थान के बारे में हम 6 मिनट पहले और बड़े क्षेत्र का कुछ घंटे पहले अलर्ट दे सकते हैं। श्री शाह ने कहा कि हमने शीतलहर और भीषण गर्मी के लिए कार्य योजना बनाई है, लेकिन इन पर अमल नहीं होता है। उन्होंने कहा कि अगर अर्ली वॉर्निंग देने वाली ऐजेंसियां और इस प्रकार की चेतावनी अमल में आ जाए तो काफी जानें बचाई जा सकती हैं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि भारत में आपदा प्रबंधन की यात्रा थोड़ी देर से शुरू हुई। 1995 में तत्कालीन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन केन्द्र की स्थापना हुई और वो कृषि विभाग के अंतर्गत शुरू हुआ। ये एक अच्छी शुरूआत थी। उसके बाद हमारे देश में दो वर्षों में दो बड़ी घटनाएं हुईं। 1999 में ओडिशा में सुपर सायक्लोन आया और 10000 लोग मारे गए। इसके बाद वर्ष 2001 में भुज में आए भूकंप में 14000 लोग मारे गए। इन दोनों घटनाओं ने देश और सरकार के व्यवस्था तंत्र को झकझोर कर रख दिया और वहीं से विचार आया कि क्यों ना एक ऐसी व्यवस्था की जाए जो अपने आप में स्वतंत्र हो और ऐसी ऐजेंसियों के साथ जुड़े जो तत्काल रिस्पॉंड कर सके। उस वक़्त अटल जी देश के प्रधानमंत्री थे और उन्होंने एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया और संयोग से उसी वक़्त श्री नरेन्द्र मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने भी गुजरात में इस पर काफ़ी चिंतन किया और इसे एक मूर्त रूप देने की बात शुरू हुई और 2005 में एनडीएमए की स्थापना हुई, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री जी होते हैं।

श्री शाह ने कहा कि असल में एनडीएमए की शुरूआत भोपाल त्रासदी के बाद हो जानी चाहिए थी, क्योंकि ये एक ऐसी घटना थी जिसने देश को झकझोर कर रख दिया था, एक ही शहर में 8,000 लोगों की मृत्यु होना एक बहुत बड़ी घटना थी। उन्होने कहा कि अटल जी के समय ये यात्रा शुरू हुई और आज जब पिछले 17 वर्षों की तरफ मुड़कर देखते हैं तो हम बहुत बड़ी मंज़िल तय कर चुके हैं, लेकिन अभी बहुत लंबा रास्ता बाक़ी है, हम अभी संतुष्ट होने की स्थिति में नहीं पहुंचे हैं। श्री शाह ने कहा कि हमारा लक्ष्य एक ऐसा आपदा प्रबंधन तंत्र बनाने का होना चाहिए कि कितनी भी घोर आपदा हो, एक भी व्यक्ति की जान ना जाए, और देश के प्रधानमंत्री जी ने भी हमारे सामने यही लक्ष्य रखा है। अप्रोच में जो बदलाव आया है, इसके बहुत अच्छे परिणाम मिले हैं, 1999 के तूफ़ान में 10,000 लोगों की मृत्यु हुई थी और इस साल तीन तूफ़ान आए हैं लेकिन मृत्यु का आंकड़ा 50 से ज़्यादा नहीं है। अब हम बहुत पहले से ही इसकी चेतावनी दे देते हैं, वहां से लोगों को बचाने का काम होता है, कच्चे घरों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की व्यवस्था होती है। केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि राज्यों ने भी इसके लिए बहुत अच्छा तंत्र खड़ा किया है और केन्द्र और राज्य मिलकर मृत्यु का आंकड़ा बहुत कम करने में सफल हुए हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि अब पूरा दृष्टिकोण बदल गया है। पहले आपदाओं के प्रति सरकारों का दृष्टिकोण राहत-केन्द्रित था। आपदा के बाद सबकी मदद की जाए, उन्हें पैसा दिया जाए, बसाने, खाने की व्यवस्था हो, बीमारी फैलने की स्थिति में दवाओं की व्यवस्था हो। लेकिन अब, पूर्व चेतावनी, सक्रिय निवारण, पूर्व तैयारी और कम से कम जान के नुक़सान पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। अप्रोच में आए इस बदलाव को हमें जारी रखना चाहिए और शून्य नुक़सान तक पहुंचने की व्यवस्था करनी चाहिए।

अमित शाह ने कहा कि अगर किसी भी दृष्टि से एनडीआरएफ़ और एसडीआरएफ़ की समीक्षा की जाए तो इन्होंने सबसे बड़ा काम देश की जनता के मन में विश्वास पैदा करने का किया है। आज कहीं पर कोई भी बड़ी आपदा आती है, एनडीआरएफ़ की वर्दी में जवानों के पहुंचते ही, अधर में फंसे लोगों को लगता है कि अब उन्हे बचा लिया जाएगा। लोगों के मन में ये विश्वस्तता, त्याग, कठोर परिश्रम, अनुशासन और सतत प्रशिक्षण के बिना नहीं हो सकती। किसी के लिए अपनी जान जोखिम में डालने का संस्कार पैदा करने का काम एनडीआऱएफ़ ने बहुत ही अच्छी तरह से किया है।

अमित शाह ने कहा कि वर्ष 2016 में नरेन्द्र मोदी जी ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, एनडीएमपी की शुरुआत की और देश में तैयार की गई पहली राष्ट्रीय योजना का ख़ाका रखा। बाद में सेंडाई आपदा जोखिम निम्नीकरण फ्रेमवर्क के अंतर्गत यह योजना बनाई गई है और इसमें जोखिम और जानमाल के नुकसान को न्यूनतम करने के सभी पहलुओं को कवर किया गया है। अब सरकार ने सभी एजेंसियो और विभागो, सभी छोटी से छोटी इकाईयों का एकीकरण करने की भी योजना तैयार की है। उन्होंने कहा कि चाहे कोई छोटा गांव हो या बड़ा मेट्रो शहर हो या फिर दूर-दराज़ का कोई ज़िला हो, या फिर समुद्र तट पर बसा शहर, हर जगह पर आपदा के ख़िलाफ़ लड़ने की पूरी योजना तैयार है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि देशभर में कई बड़े उद्योग हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हैं और कई बड़ी कंपनियों के पास आपदा के ख़िलाफ़ लड़ने के संसाधन भी उपलब्ध हैं, लेकिन पहले इन्हें कभी शासन के साथ जोड़ा नहीं गया। आज हर कलेक्टर के पास उसके ज़िले में आपदा के ख़िलाफ़ लड़ने के उपलब्ध संसाधनों, चाहे वो सरकार के पास हों या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पास या फिर निजी कंपनियों के पास, की कंप्यूटराइज़्ड सूची है। इन्हें उपयोग करने की व्यवस्था भी है और जैसे ही चेतावनी आती है, तुरंत इन संसाधनों को प्रयोग में लिया जा सकता है। पहले, जब आपदा आती थी तो ये सब संसाधन उपयोग में नहीं आते थे, लेकिन यह योजना बनने के कारण इन सबका उपयोग हो रहा है और जान हानि कम से कम हो रही है और यह एक बहुत बड़ा काम है।

अमित शाह ने कहा कि 2016 से अब तक, पहले सिर्फ़ नौ आपदाओं का समाधान एनडीएमए ने प्रस्तुत किया था और अब आठ और आपदाओं का समाधान प्रस्तुत किया है। इस प्रकार कुल 17 प्रकार की आपदाओं के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए एनडीएमए ने कार्य योजना लोगों के सामने रखी है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जो आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए एक 10 सूत्रीय कार्यक्रम दुनिया के सामने प्रस्तुत किया था, इसके तहत भारत की पूरी जिम्मेदारी है कि हम इस पर अच्छे से अमल करें। उन्होंने कहा कि हमें इन सबके परिणाम भी मिले हैं, लेकिन हमें शून्य के लक्ष्य की ओर बढ़ना है। श्री शाह ने कहा कि आपदा प्रबंधन में लगे सभी  एनजीओ, सामाजिक कार्यकर्ता  और सरकारी कर्मचारियों के लिए श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार ने सुभाष चंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार भी शुरू किया है, जिससे उनकी हौसला अफज़ाई हो सके और एक प्रकार की सार्वजनिक स्वीकृति मिल सके। श्री शाह ने कहा कि पिछले 2 साल में हमने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं। बहुत जगह पर तूफ़ान भी आए, बाढ़ भी आई, भूस्खलन का तो रिकॉर्ड ही टूट गया है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में पहली बार भूस्खलन देखने को मिला। फिर भी इन 2 वर्षों में हम हर जोखिम से बहुत सफल तरीके से लड़े हैं और एनडीआरएफ़ को इसके लिए जितनी भी बधाई दी जाए, वो कम है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि सरकार ने जोखिम के ख़िलाफ़ लड़ने के साथ-साथ राहत के काम को नज़रअंदाज़ नहीं किया है।उन्होंने कहा कि पहले अंतरमंत्रालय केन्द्रीय दल (IMCT) आपदा ख़त्म होने के बाद राज्य में जाते थे और नुक़सान के आंकलन का सत्यापन करते थे और फिर राज्य को राशि भेजी जाती थी, जिसमें काफ़ी समय बर्बाद होता था। लेकिन, अब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने फैसला लिया है कि किसी रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं है, और हम एक अग्रिम आईएमसीटी दल भेजते हैं, जो प्राथमिक अनुमान के अनुसार तत्काल राहत राज्य को देती है जिससे आपदा के दौरान ही उन्हें मदद मिल सके।

अमित शाह ने कहा कि राहत के काम को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है और इसके कारण आज बहुत परिवर्तन देखने को मिलता है। वर्ष 2019-20 में 19 आईएमसीटी की टीम में 17 राज्यों में गई, वर्ष 2020-21 में 14 राज्यों में 22 टीमें गईं, जो कि एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि एनडीआरएफ़ और एसडीआरएफ़ के तहत लगभग 53,000 करोड़ रूपए और 60 हजार करोड़ रूपए की राशि इस काम के लिए देने का काम नरेन्द्र मोदी सरकार ने किया है।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि भीषण गर्मी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए भी एक एक्शन प्लान तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि भीषण गर्मी यानी हीट वेव के ख़िलाफ़ भी आपदा मित्रों की रचना की जाए और उन्हें हीट वेव के लिए भी तैयार किया जाए।श्री शाह ने कहा कि सिर्फ़ एक्शन प्लान तैयार करने से कुछ नहीं होता, जब तक उसे ज़मीन पर ना उतारा जाए तब तक कुछ नहीं होता। इसको नीचे ज़मीन तक उतारने वाली ऐजेंसी आपदा मित्र ही हो सकती है, राज्य की स्थानीय निकाय हो सकते हैं, ग्राम पंचायत, तहसील या ज़िला पंचायत और म्युनिसिपल कॉरपोरेशन तक इस प्लान को पहुंचाने का काम भी हमारा ही है। उन्होंने कहा कि अभी हाल ही में यास और तौक्ते तूफ़ान आए थे, तब भी हमने बहुत अच्छा काम किया।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि जब देश में कोरोना की दूसरी लहर आई थी, तो एनडीएमए ने कोरोना के समय में मानव जाति पर आई इस विपदा के ख़िलाफ़ लड़ने का काम बहुत अच्छे तरीके से किया अगर कोई भी निष्पक्ष ऐजेंसी आकलन करे, तो वो यही कहेगी कि दुनियाभर में सबसे अच्छे तरीक़े से कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई अगर किसी देश में लड़ी गई है तो वो भारत में लड़ी गई है। 130 करोड़ की आबादी, सीमित संसाधन, सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर और दुनिया में सबसे कम मृत्युदर, और प्रति दस लाख व्यक्ति हमारे कोरोना मामलों की संख्या भी बहुत कम रही। उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े देश परेशान हो गए, जब दूसरी लहर आई। जिस समय ऑक्सीजन का संकट आया, उसी वक्त यह तूफ़ान आया। ऑक्सीजन की ट्रेनें चल रही थीं, जो ऑक्सीजन प्लांट पूर्वी क्षेत्र में थे वह सारे तूफ़ान के दायरे में आ गए थे और बिजली जाने पर ऑक्सीजन सपोर्ट पर जो मरीज़ थे, उनकी जान बचाने की कोशिश। श्री शाह ने कहा कि ये सारी बातें जनता तक नहीं पहुंचीं, लेकिन हमारे पास अग्रिम सूचना थी और गृह मंत्रालय और एनडीएमए ने मिलकर सारी योजना बनाई। एक भी जगह ऑक्सीजन ले जाने वाली ट्रेन की दुर्घटना की ख़बर नहीं थी, कोई अस्पताल नहीं था जहां बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था ना हो, बिजली के कारण एक भी व्यक्ति की जान नहीं गई, ऑक्सीजन प्लांटस  को समय पर बंद करके बहुत बड़ी दुर्घटना को हमने रोका। अगर यह सूचना समय पर ना आती, अगर एनडीआरएफ और एनडीएमए की व्यवस्था ना हुई होती तो यह कर पाना बहुत मुश्किल था और सैकड़ों लोगों की जान जाने की आशंका थी। उन्होंने कहा कि उस वक़्त डर लगता था कि क्या होगा जब वास्तव में तूफ़ान आएगा और चहे कितनी भी व्यवस्था कर लें, क़ुदरत के सामने वह विफल हो जाती है। यह कहते हुए संतोष और गर्व दोनों हैं कि श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में उस तूफ़ान के दौरान कोरोना का इलाज करा रहे एक भी मरीज़ की जान बिजली या ऑक्सीजन के कारण नहीं गई। यह इस बात का एक उदाहरण है कि तकनीक, अग्रिम जानकारी और नियोजन का किस प्रकार का नतीजा मिल सकता है। अमित शाह ने कहा कि हमारे देश ने एक नई शुरुआत की है। भारत ने मिडिल और हाई स्कूल के अंदर आपदा प्रबंधन की शिक्षा शुरू की है क्योंकि आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण मदद तो करेगा मगर पर्याप्त नहीं होगा। लेकिन अगर बच्चों में आपदा प्रशिक्षण और आपदा प्रबंधन का संस्कार डालेंगे तो प्रशिक्षण की भी कम ज़रूरत पड़ेगी। इतने बड़े देश में जब मिडिल और हाई स्कूल में बच्चे आपदा प्रबंधन के विषय को सीखते हैं और इस संस्कार को आत्मसात करते हैं और जब वे वयस्क नागरिक बन जाएंगे तो कहीं भी देश में आपदा आएगी तो वह संस्कार तुरंत ही सतह पर आ जाएगा और उन्हें लोगों की मदद के लिए खड़ा कर देगा।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि उत्तरपूर्व में एक बहुत बड़ी शुरुआत के तहत हमने एक नया प्रयोग किया है। नेसैक (NESAC) के माध्यम से नॉर्थईस्ट में अंतरिक्ष विज्ञान का उपयोग करने के लिए एक सोसाइटी बनाई गई है। उपग्रहों की तकनीक का उपयोग करके हम विकास कैसे कर सकते हैं। हमने वहां पर गत साल से अग्रिम नियोजन कर आपदा प्रबंधन में भी इसका उपयोग करने की शुरुआत की है। नॉर्थईस्ट में ब्रह्मपुत्र नदी में बाढ़ आना निश्चित है, परंतु वहां टोपोग्राफी इस प्रकार की है कि हम सरलता से बाढ़ आने के पहले ब्रह्मपुत्र का पानी हजारों हेक्टेयर के सरोवर में ट्रांसफर कर सकते हैं। अगर हम सरोवर बना देते हैं तो ब्रह्मपुत्र में बाढ़ आने की संभावना 40% कम हो जाती है। नेसैक इस प्रकार की लोकेशन ढूंढने का काम कर रहा है और इसमें सफलता भी मिली है। अब तक 19 लोकेशन ढूंढ ली गई हैं, जहां बड़े सरोवर बन जाएँगे और वहां पानी भेजने में ऊर्जा भी नहीं लगेगी, टोपोग्राफी से ही पानी वहां पहुंच जाएगा। ये एक नए प्रकार की शुरुआत है और इसे हम एक चरण और आगे ले गए हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उत्तरपूर्व में विकास की बयार आई है और बहुत सारी सड़कें बन रही हैं, क्योंकि कनेक्टिविटी के बगैर नॉर्थ-ईस्ट का विकास संभव ही नहीं है। लेकिन ये सड़कें और रेल, पानी का प्राकृतिक बहाव भी रोकते हैं और हमने उपग्रहों की मदद लेकर जहां सड़कें और रेल बन रही हैं वहाँ पानी के प्राकृतिक बहाव वाले रास्ते सटीक तरीके से चिन्हित किए हैं जिससे सड़क के नीचे से पानी जाने की व्यवस्था पहले ही कर दी जाए। उन्होंने कहा कि देशभर में राजमार्गों के निर्माण में 15 साल से इस बात का ध्यान नहीं रखा गया है इसलिए जब बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण करने जाते हैं तो पता चलता है कि सड़क के एक तरफ़ पानी नहीं है और दूसरी तरफ़ पूरा क्षेत्र जलमग्न है, क्योंकि उसका प्राकृतिक बहाव रोक दिया गया है। उन्होंने कहा कि उपग्रहों का उपयोग सड़क निर्माण और रेलवे निर्माण में बाढ़ मैपिंग के लिए भी किया है।

अमित शाह ने कहा कि देश के 36 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में से 27 आपदा के अति जोखिम वाले राज्य है और 58% भूभाग साधारण से लेकर अति उच्चतम तीव्रता वाले भूकंप संभावना ग्रस्त क्षेत्र है, 12% बाढ़ का कटाव वाला क्षेत्र है जहां नदी कटाव करके बहती है। लगभग 7516 किलोमीटर समुद्री तट चक्रवात के जोखिमों से चिन्हित किया हुआ है, कृषि योग्य क्षेत्रफल में से 68% भूभाग, हर तीसरे साल जहां सूखा आता है, पहाड़ी क्षेत्रों में लगभग 15% भूभाग भूस्खलन के लिए सबसे जोखिम वाला क्षेत्र है। करीब 5,161 शहरी इकाईयां, चाहे म्युनिसिपाल्टी हो या म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन हो, वह बाढ़ की संभावना वाली हैं और ऐसे वक़्त में हमारे देश में आपदा प्रबंधन बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का काम है। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी जी के आने के बाद बहुत काम हुआ है। नरेन्द्र मोदी जी ही एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए, आपदा क्यों आती है, इस पर ध्यान देना शुरू किया। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग, दोनों पर ध्यान देने के लिए देश में सबसे पहले गुजरात में जलवायु परिवर्तन विभाग की व्यवस्था अस्तित्व में लाने का काम श्री नरेन्द्र मोदी जी ने किया था क्योंकि आपदा का प्रबंधन करना एक बात है और आपदा न आए, ऐसा प्रबंधन करना दूसरा काम है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में पेरिस समझौते में पूरी दुनिया भारत की भूमिका सराहना की करती है। देशभर में सिंगल यूज प्लास्टिक के लिए जागरूकता फैलाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के खिलाफ बिजली के उत्पादन को सौर तथा विंडमिल में परिवर्तित करने का काम भी बहुत अच्छे तरीके से किया है।

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