1857 की क्रांति में बलिया के मुड़ीकटवा गांव और वीर कुंवर सिंह की अनसुनी गाथा

बलिया

दिनेश कुमार पांडेय, बलिया

उत्तर प्रदेश के बलिया में 23 अप्रैल का दिन ‘जयोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है, जब 1857 की क्रांति के नायक बाबू वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी वीरता और बलिदान की अमिट छाप छोड़ी। यह कहानी है उस महान योद्धा की, जिन्होंने गंगा माता को अपना कटा हुआ हाथ अर्पित कर स्वतंत्रता की ज्वाला को प्रज्वलित रखा।

1857 की क्रांति

1857 का वह दौर था, जब अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था। बिहार के जगदीशपुर के राजा वीर कुंवर सिंह के मन में स्वतंत्रता की चिंगारी भड़क रही थी। आरा, दुल्लौर, अतरौलिया, आजमगढ़ और सिवान के रास्ते अंग्रेजों से लोहा लेते हुए वे बलिया के कुशहर गांव के मुड़िकटवा मैदान पहुंचे। थकान से चूर, लेकिन हौसलाअटूट। उधर, अंग्रेज कप्तान डगलस की सेना उनका पीछा कर रही थी।

बलिया का मुड़ीकटवा गांव

कुशहर में विश्राम के दौरान पचरूखा देवी मंदिर के पास एक दिव्य ज्योति ने कुंवर सिंह को सुरक्षित आगे बढ़ने का संदेश दिया। दूसरी ओर, गांववासियों को अंग्रेजों के आने की भनक लग चुकी थी। सहतवार थाना क्षेत्र के कुशहर के ग्रामीणों ने अपने नायक की रक्षा का प्रण लिया। बांस के खप्चर, लाठी, भाला और फरसे लेकर वे अरहर के खेतों और खर-पतवार के झुरमुट में छिप गए।

स्वतंत्रता संग्राम की अनसुनी कहानी

जैसे ही डगलस की सेना मुजवावानी और पगडंडी के रास्ते आगे बढ़ी, ग्रामीणों ने घात लगाकर हमला बोला। एक-एक कर 106 अंग्रेज सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह था बलिया के शौर्य का वह पल, जिसने इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में जगह बनाई। इसी बीच, कुंवर सिंह गंगा तट पर पहुंचे और नाव से जगदीशपुर के लिए रवाना हुए।

लेकिन तभी अंग्रेज सैनिक बेली ने उन पर गोली चला दी, जो उनकी बांह में लगी। गोली का जहर पूरे शरीर में न फैले, इसलिए वीर कुंवर सिंह ने तलवार से अपनी बांह काटकर गंगा माता को अर्पित कर दी। “हे गंगा माई, जब तोहरे इच्छा बा…” कहकर उन्होंने अपने बलिदान को अमर कर दिया। घायल अवस्था में वे जगदीशपुर पहुंचे, लेकिन अत्यधिक रक्तस्राव के कारण 23 अप्रैल को वीरगति को प्राप्त हुए।
मुड़िकटवा मैदान में जब कप्तान डगलस पहुंचा, तो अपने सैनिकों के शवों को देखकर स्तब्ध रह गया।

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