“जो भी जीते, जीत AI की होगी।” अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का यह बयान कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI को लेकर दुनिया में चल रही होड़ की तरफ इशारा करता है। लेकिन आम आदमी के लिए इससे भी बड़ा सवाल दूसरा है। अगर मोबाइल पर दिखाई देने वाला चेहरा नकली हो, फोन पर सुनाई देने वाली आवाज किसी परिचित की हूबहू नकल हो और सामने वाला उसी अंदाज में पैसे मांगे, जिस तरह आपका अपना कोई व्यक्ति बात करता है, तो असली और नकली की पहचान कैसे होगी?
यही AI के भविष्य की सबसे बड़ी साइबर सुरक्षा चुनौतियों में शामिल है।
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AI हमारे काम को आसान बना रहा है। इसका इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, खेती, उद्योग और सरकारी सेवाओं में बढ़ रहा है। लेकिन यही तकनीक अपराधियों के हाथ लगने पर डीपफेक, नकली आवाज और ऑनलाइन ठगी को पहले से ज्यादा विश्वसनीय बना सकती है।
AI की दौड़ इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई?
दुनिया के बड़े देश AI को भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीक मान रहे हैं। कारण साफ है। इसकी मदद से बहुत कम समय में बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण किया जा सकता है। मशीनें कई ऐसे काम कर सकती हैं जिनमें पहले काफी समय और कर्मचारियों की जरूरत पड़ती थी।
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कारखानों में स्वचालित मशीनों से लेकर बैंक में संदिग्ध लेनदेन की पहचान तक इसका इस्तेमाल हो सकता है। डॉक्टरों को बीमारी की पहचान में सहायता, विद्यार्थियों को पढ़ाई और किसानों को मौसम या फसल से जुड़ी जानकारी देने में भी AI की भूमिका बढ़ सकती है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू साइबर अपराध है।
AI से साइबर ठगी कैसे बदल सकती है?
अभी तक ऑनलाइन ठगी में अपराधी अक्सर बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी, रिश्तेदार या किसी कंपनी का कर्मचारी बनकर फोन करते हैं। कई बार उनकी भाषा या आवाज से पीड़ित को संदेह हो जाता है।
AI इस कमजोरी को काफी हद तक दूर कर सकता है।
अपराधी किसी व्यक्ति की ऑनलाइन उपलब्ध आवाज के नमूने का इस्तेमाल कर उसकी जैसी नकली आवाज तैयार कर सकता है। इसी तरह फोटो और वीडियो की मदद से डीपफेक वीडियो बनाया जा सकता है।
मान लीजिए आपको बेटे, बेटी, मित्र या वरिष्ठ अधिकारी जैसी आवाज में फोन आता है और कहा जाता है कि तुरंत पैसे भेजिए। आवाज इतनी मिलती-जुलती हो कि संदेह ही न हो। ऐसी स्थिति में सामान्य साइबर जागरूकता भी परीक्षा में पड़ सकती है।
इसलिए AI के दौर में एक नया सुरक्षा नियम याद रखना होगा:
आवाज सुनकर या चेहरा देखकर तुरंत भरोसा न करें। पैसे की मांग हो तो दूसरे माध्यम से पुष्टि जरूर करें।
डीपफेक ठगी क्या है?
डीपफेक में AI की मदद से किसी व्यक्ति का चेहरा, आवाज या वीडियो इस तरह तैयार या बदला जा सकता है कि वह असली जैसा दिखाई दे।
इसका इस्तेमाल मनोरंजन और दूसरे वैध कामों में भी होता है, लेकिन धोखाधड़ी में इसका उपयोग गंभीर खतरा बन सकता है।
किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के नाम से निवेश का नकली वीडियो बनाया जा सकता है। किसी अधिकारी जैसी आवाज में कर्मचारी से रकम भेजने को कहा जा सकता है। रिश्तेदार की आवाज की नकल कर आपात स्थिति का बहाना बनाया जा सकता है।
इसीलिए अब इंटरनेट पर देखना और सुनना अपने आप में किसी बात के सच होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
AI और रोजगार का सवाल
AI की चर्चा होते ही एक सवाल सामने आता है कि क्या इससे नौकरियां खत्म हो जाएंगी?
इसका उत्तर सीधा हां या ना में देना ठीक नहीं होगा। कुछ ऐसे काम, जिन्हें बार-बार एक ही तरीके से किया जाता है, मशीनों के जरिए होने लग सकते हैं। दूसरी तरफ AI से जुड़े नए काम और रोजगार भी पैदा होंगे।
भारत के लिए बड़ी जरूरत कर्मचारियों और युवाओं को नए कौशल सिखाने की है।
AI की जानकारी अब इंजीनियर और कंप्यूटर विशेषज्ञ तक सीमित नहीं रह सकती। बैंक कर्मचारी को AI आधारित ठगी समझनी होगी, पुलिस को नकली डिजिटल सबूत पहचानने होंगे, पत्रकार को असली और नकली वीडियो में फर्क करना होगा और आम नागरिक को यह समझना होगा कि इंटरनेट पर दिखने वाली हर चीज असली नहीं होती।
भारत AI के लिए क्या तैयारी कर रहा है?
भारत ने मार्च 2024 में IndiaAI Mission को मंजूरी दी थी, जिसके लिए पांच वर्षों में 10,371.92 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। इसका उद्देश्य देश में AI से जुड़ी कंप्यूटिंग क्षमता, शोध, कौशल और उपयोग को बढ़ावा देना है।
इसके बाद भारत ने सुरक्षित और जिम्मेदार AI के लिए व्यवस्था बनाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। IndiaAI Safety Institute इसी प्रयास का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य AI से पैदा होने वाले जोखिमों को समझने, सुरक्षा के तरीके विकसित करने और भरोसेमंद AI को बढ़ावा देने में सहयोग करना है।
यानी भारत के सामने अब सवाल AI को अपनाने या न अपनाने का नहीं है। असली सवाल यह है कि इसे कितनी सुरक्षित तरीके से अपनाया जाए।
साइबर सुरक्षा भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत में डिजिटल भुगतान और मोबाइल बैंकिंग का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर होता है। करोड़ों लोग फोन से पैसे भेजते हैं, खरीदारी करते हैं और सरकारी सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में AI आधारित ठगी का असर सीधे आम लोगों के बैंक खाते तक पहुंच सकता है।
भविष्य में बैंक और वित्तीय संस्थानों को ऐसे सुरक्षा उपायों की जरूरत होगी जो असामान्य लेनदेन को तेजी से पहचान सकें। पुलिस को डीपफेक और नकली आवाज की जांच के लिए तकनीकी साधन और प्रशिक्षण चाहिए। सोशल मीडिया कंपनियों को भी नकली और धोखाधड़ी वाली सामग्री की पहचान में अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
आम आदमी अभी क्या कर सकता है?
सबसे जरूरी उपाय तकनीकी नहीं बल्कि व्यवहार से जुड़ा है। अगर किसी परिचित की आवाज में अचानक पैसे मांगे जाएं तो कॉल काटकर उसके पुराने और भरोसेमंद नंबर पर खुद फोन करें। वीडियो कॉल पर दिखाई देने वाला चेहरा परिचित होने के बावजूद असामान्य मांग पर तुरंत भरोसा न करें।
बैंक का OTP, PIN, CVV और पासवर्ड किसी को न दें। सोशल मीडिया पर अपनी निजी आवाज और वीडियो साझा करते समय भी सोचें कि उनका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है।
परिवार में एक ऐसा निजी सवाल या शब्द भी तय किया जा सकता है जिसका जवाब बाहरी व्यक्ति को पता न हो। आपात स्थिति बताकर पैसे मांगने वाले संदिग्ध कॉल की जांच में यह तरीका मदद कर सकता है।
AI की असली परीक्षा अब शुरू होगी
डोनाल्ड ट्रम्प का “जो भी जीते, जीत AI की होगी” वाला कथन देशों के बीच तकनीकी होड़ की तरफ ध्यान खींचता है। भारत के लिए इस दौड़ का अर्थ सिर्फ ज्यादा शक्तिशाली AI बनाना नहीं होना चाहिए।
असली सफलता तब होगी जब AI से देश की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को फायदा मिले, लेकिन उसी तकनीक का इस्तेमाल नागरिकों की पहचान, पैसा और भरोसा चुराने में आसान न हो।
आने वाले समय में शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा कि AI क्या कर सकता है, बल्कि यह होगा कि AI जो दिखा रहा है, उस पर कितना भरोसा किया जा सकता है।











