कल्पना कीजिए, एक सुबह आप सोकर उठते हैं और आपके मोबाइल का नेटवर्क गायब है। एटीएम से पैसे नहीं निकल रहे हैं, बिजली का ग्रिड ठप्प है और आपके शहर की ट्रैफिक लाइटें अस्त व्यस्त हैं। बिना एक गोली चले देश संकट में आ जाता है। यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म का सीन नहीं बल्कि 2026 की कड़वी हकीकत है।
आधुनिक युद्ध का बदलता स्वरूप क्या है?
रूस-यूक्रेन के युद्ध से लेकर मध्य-पूर्व के संघर्षों तक अब युद्ध का असली चेहरा टैंकों के लोहे में नहीं, बल्कि कंप्यूटर के कोड और ‘एजेंटिक एआई’ के एल्गोरिदम में छिपा है। डिजिटल हथियार अब केवल जासूसी का जरिया नहीं, बल्कि सामूहिक विनाश का नए साधन बन चुके हैं।
साइबर हमले, डिजिटल जासूसी और सूचना युद्ध के जरिए देशों की आर्थिक और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया जा रहा है। सवाल यह है कि इस बदलते परिवेश में आम नागरिक कितना सुरक्षित है।
आधुनिक युद्ध का स्वरूप जमीन, हवा और पानी से निकलकर साइबर स्पेस में घुस चुका है। 17 सितंबर 2024 को लेबनान में एक के बाद एक कई पेजर धमाके और दूसरे दिन वॉकी-टॉकी में हुए धमाकों ने युद्ध के बदलते स्वरूप का संकेत दे दिया था।
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यानि कभी युद्ध का मतलब टैंक, मिसाइल और सैनिकों की भीड़ंत होता था, लेकिन अब लड़ाई का एक नया मैदान तैयार हो चुका है-डिजिटल दुनिया। कीबोर्ड और कोड के जरिए भी किसी देश की व्यवस्था को प्रभावित किया जा सकता है।
ईरानी नेता खामनेई के लिए ट्रैफिक कैमरों और सीसीटीवी हैक की बात सार्वजनिक हो चुकी है। इसी तरह ईरान प्रायोजित मडी वॉटर साइबर जासूसी समूह ने कई साइबर हमलों को अंजाम दिया है। इसकी मदद से मीना (MENA) क्षेत्र के संगठनों को निशाना बनाया गया था।
इसी तरह रूसी हैकर्स का इंटीक्रेप्टेड चैट को पढ़ने के लिए सोशल इंजीनियरिंग की मदद से लिंक्ड डिवाइस का चैट पढ़ना आधुनिक खतरनाक साइबर हमलों में से एक है।
डिजिटल हथियार क्या होते हैं और कैसे काम करते हैं?
मैलवेयर और रैंसमवेयर किसी देश की पूरी बैंकिंग व्यवस्था को हाईजैक कर सकते हैं। सप्लाइ चेन अटैक किया जाता है डिजिटल टाइम बम की मदद से। ये सामान आप तक पहुंचने से पहले ही डिजिटल टाइम बम के जरिए सप्लाइ चेन तोड़ देते हैं।
इसके अलावा भी एक खतरनाक डिजिटल हथियार है एआई बॉट। इसके जरिए फेक न्यूज फैलाकर दंगे और भय का वातावरण बनाया जाता है। दिल्ली एनसीआर से लेकर देश के कई शहरों में स्कूलों को बम से उड़ाने वाले संदेश इसके उदाहरण हो सकते हैं।
रूसी हैकर्स का समूह यूजर्स को नकली क्यूआर कोड स्कैन करने या वैरीफिकेशन कोड साझा करने के लिए बहकाते हैं। इसके बाद यह हैकर्स सिग्नल और व्हाट्स एप्प जैसे मैसेजिंग का पिन कोड मांगते हैं।
एक बार लिंक होने पर हमलावर का डिवाइस वास्तविक समय में बातचीत को मिरर करता है। इस तरह के हैकर्स का सर्वाधिक खतरा सरकारी कर्मचारी, पत्रकार, सैन्यकर्मी, राजनयिक और नीति निर्माता होते हैं।
इसी तरह एआई डीपफेक वीडियो या ऑडियो के सहारे अपनी जाल में फांसता है। हाल ही में पाकिस्तान द्वारा भारतीय वायु सेना कर्मी का डीपफेक वीडियो इसका ताजा उदाहरण है। ईरान प्रायोजित साइबर जासूस मडी वॉटर को कई नाम से जाना जाता है।
यह डिजिटल हथियार ईरान के खुफिया मंत्रालय के अधीन करता है। साल 2017 से ही यह मध्य-पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका तक फैला हुआ है। ईरानी रणनीति के हिसाब से यह साइबर जासूसी, व्यवधान और प्रबंधन में पारंगत है। यह किसी देश के दूरसंचार, तेल, गैस और रक्षा संगठनों को निशाना बनाते हैं।
आम आदमी साइबर हमले का सॉफ्ट टारगेट क्यों है?
युद्ध अब केवल सैनिकों के बीच नहीं है। अगर किसी देश का सैटेलाइट सिस्टम हैक होता है तो आपका जीपीएस भी काम करना बंद कर देगा। डिजिटल युद्ध की सबसे बड़ी मार आम आदमी की प्राइवेसी और उसकी जमापूंजी पर पड़ती है।
भारत में साइबर क्राइम से कितना नुकसान हुआ?
इंडियन साइबर क्राइम कार्डीनेशन द्वारा नेशन क्राइम रिकार्ड ब्यूरो से संकलित आंकड़ों के मुताबिक भारत में साइबर क्राइम के कारण पिछले छह सालों में 52, 976 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है।
साल 2024 में 22,845 करोड़ रुपये से ज्यादा जबकि 2025 में 19, 813 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। बड़ी बात ये है कि साइबर क्राइम के जाल में उच्च पदों पर बैठे लोगों ने भी करोड़ रुपये गंवाए।
2026 में भारत की साइबर चुनौतियां
भारत जैसे तेजी से डिजिटल होते देश के लिए ‘साइबर सुरक्षा’ अब ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के बराबर है। साइबर हमले अब मध्य-पूर्व के आधुनिक संघर्ष का अभिन्न हिस्सा है।
दूरसंचार और उर्जा क्षेत्रों पर हमले सीधे आम नागरिकों को प्रभावित करते हैं। इसलिए देशों के सैन्य सिद्धांत में साइबर रक्षा को शामिल करना होगा। एक साथ गलत सूचना, जासूसी और ढांचे में व्यवधान की संभावना को ध्यान में रखकर नीति तैयार करनी होगी।
सरकारी नेटवर्क बनाने के साथ साथ पारदर्शिता से जनता का भरोसा बनाए रखना भी जरूरी है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर खुफिया जानाकारियों का साझाकरण, मैलवेयर का पता लगाने के साथ साथ यह भी जरूरी है कि नागरिकों को फिशिंग, डीपफेक और गलत सूचनाओं के बारे में शिक्षित किया जाए।
भारत सरकार साइबर अपराधों को लेकर काफी गंभीर है। संचार साथी और कवच जैसे एप्प इसमें अहम भूमिका निभा भी रहे हैं। इसके साथ ही जरूरी है कि लोगों को जागरूक बनाया जाए।
निष्कर्षः
युद्ध अब जीतने के लिए नहीं बल्कि दूसरों को ‘पंगु’ बनाने के लिए लड़े जा रहे हैं। मतलब साफ है ‘तकनीक’ के साथ-साथ ‘तकनीकी सतर्कता’ को भी अपना हथियार बनाना होगा।

आलोक वर्मा PIB मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार | खोजी पत्रकारिता विशेषज्ञ
25 से अधिक वर्षों के अनुभव के साथ आलोक वर्मा प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल मीडिया में खोजी पत्रकारिता के जाने-माने नाम हैं। News18 India, Zee News, Republic Bharat, BAG Films और दैनिक जागरण जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में काम कर चुके आलोक वर्मा ने CBI, ED और दिल्ली पुलिस से जुड़े कई बड़े मामलों की रिपोर्टिंग की है। आरुषि तलवार हत्याकांड, मधु कोड़ा माइनिंग घोटाला और संसद हमले जैसे हाई-प्रोफाइल केस इनकी कवरेज में शामिल रहे हैं। भारत सरकार द्वारा PIB मान्यता प्राप्त इस स्वतंत्र पत्रकार के लेख अब indiavistar.com पर प्रकाशित होते हैं।








