चीन के साइबर धोखाधड़ी नेटवर्क को वर्चुअल sim बॉक्स की मदद मिल रही है। हाल ही में गुरुग्राम पुलिस की एक कार्रवाई में यह बात फिर से सामने आई है। गुरुग्राम में पकड़ा गया वर्चुअल SIM बॉक्स रैकेट दिखाता है कि चीन-आधारित साइबर धोखेबाज़ भारत में कॉल रूटिंग के जरिए कैसे लोगों को ठग रहे हैं। सवाल यह है कि क्या हमारी स्थानीय पुलिस इसके लिए तैयार है?
चीन साइबर धोखाधड़ी को कैसे मिल रही थी मदद
गुरुग्राम में एक महिला की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह साफ कर दिया कि चीन-आधारित साइबर धोखेबाज़ भारत में कितनी गहराई से नेटवर्क बना चुके हैं। आरोप है कि वह अपने पति के साथ किराए के मकान से वर्चुअल SIM बॉक्स चला रही थी। यह तकनीक अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कॉल को स्थानीय मोबाइल कॉल में बदल देती है, जिससे ठगों की असली लोकेशन छिप जाती है और आम नागरिक आसानी से निशाना बनते हैं।
यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी गुरुग्राम और देश के कई हिस्सों में ऐसे सेटअप पकड़े जा चुके हैं, जिनका इस्तेमाल डिजिटल अरेस्ट और फर्जी निवेश स्कैम में हुआ।
सिम बॉक्स क्या है और चीन का कनेक्शन क्यों गंभीर है
SIM बॉक्स एक ऐसा उपकरण होता है जिसमें एक साथ कई सिम कार्ड लगाए जाते हैं। चीन में बैठे ठग इंटरनेट कॉल करते हैं, जो इस बॉक्स के जरिए भारत के लोकल नंबर से आती हुई दिखती है। कॉल रिसीव करने वाले को लगता है कि फोन किसी भारतीय नंबर से आया है, जबकि असल में कॉल सीमा पार से हो रही होती है।
यहीं सबसे बड़ा खतरा है। पहचान छिप जाती है, ट्रेस करना मुश्किल हो जाता है और ठगी का स्केल कई गुना बढ़ जाता है।
इस केस में सबसे अहम बात यह नहीं कि एक आरोपी पकड़ी गई। असली सवाल यह है कि क्या ऐसे सेटअप पहले भी चल रहे थे और हमें पता नहीं चला। एक साधारण किराए के मकान से चल रहा सिस्टम यह बताता है कि स्थानीय स्तर पर पहचान और निगरानी में बड़ी कमी है।
पुलिस ट्रेनिंग क्यों अब विकल्प नहीं, जरूरत है
एक विशेषज्ञ यहां तुरंत नोटिस करेगा कि समस्या केवल तकनीक की नहीं है, बल्कि क्षमता की है।
- कई थानों को यह तक नहीं पता होता कि SIM बॉक्स दिखता कैसा है
- कॉल ट्रैफिक के पैटर्न को समझने की ट्रेनिंग नहीं होती
- टेलीकॉम एजेंसियों और पुलिस के बीच रियल-टाइम समन्वय कमजोर रहता है
अगर स्थानीय पुलिस को यह नहीं पता कि किस तरह के उपकरण या वायरिंग संदिग्ध है, तो छापेमारी केवल किस्मत पर निर्भर रह जाती है।
DoT की भूमिका और तकनीकी निगरानी
दूरसंचार विभाग नेटवर्क स्तर पर उन्नत स्वचालित प्रणालियों का इस्तेमाल कर रहा है। इनका मकसद कॉल रिकॉर्ड, डिवाइस पहचान और लोकेशन असंगतियों को पकड़ना है, ताकि अवैध SIM गतिविधि समय रहते रोकी जा सके।
SIM बॉक्स की पहचान कैसे होती है
1. कॉल पैटर्न विश्लेषण
एक ही सिम से असामान्य संख्या में कॉल, या ऐसा ट्रैफिक जो सामान्य मानव व्यवहार से मेल न खाए, तुरंत संदेह पैदा करता है।
2. डिवाइस और IMEI निगरानी
जब एक ही डिवाइस में कई सिम एक साथ सक्रिय हों और वह फोन की तरह नहीं बल्कि गेटवे की तरह काम करे, तो यह साफ संकेत होता है।
3. लोकेशन और टावर मैपिंग
अगर किसी दूर राज्य में रजिस्टर्ड सिम लगातार गुरुग्राम जैसे शहरों के टावर से कॉल रूट कर रही हो, तो उसे अलग से चिन्हित किया जाता है।
गुरुग्राम
4. ट्रैफिक प्रोफाइलिंग
आम यूजर कॉल, मैसेज और डेटा का मिश्रित इस्तेमाल करता है, जबकि SIM बॉक्स केवल भारी मात्रा में कॉल ट्रैफिक दिखाता है।
5. नेटवर्क स्तर पर समन्वय
अलग-अलग टेलीकॉम ऑपरेटरों के डेटा को जोड़कर उन सिम समूहों को पहचाना जाता है जो एक साथ काम कर रहे होते हैं।
चीन आधारित साइबर नेटवर्क क्यों भारत के लिए बड़ी चुनौती है
चीन में बैठे ऑपरेटर भारत की कानूनी सीमा से बाहर होते हैं। इससे प्रत्यर्पण, जांच और सजा की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। जब तक भारत में मौजूद स्थानीय लिंक को नहीं तोड़ा जाता, यह चक्र चलता रहता है।
आम नागरिक क्या करें
अनजान लोकल नंबर से आए डराने वाले कॉल पर भरोसा न करें
पुलिस या एजेंसी के नाम पर पैसों की मांग हो तो तुरंत कॉल काटें
साइबर हेल्पलाइन https://share.google/HRfS6rXKlLbHWbATZ और स्थानीय पुलिस को सूचना दें
यह मान लेना गलत होगा कि केवल तकनीकी सिस्टम से समस्या खत्म हो जाएगी। मजबूत तकनीक के साथ-साथ प्रशिक्षित पुलिस, तेज कार्रवाई और जन जागरूकता जरूरी है। गुरुग्राम का मामला एक चेतावनी है कि चीन-आधारित साइबर धोखाधड़ी अब दूर की समस्या नहीं रही।
FAQs
SIM बॉक्स क्या होता है?
यह एक ऐसा उपकरण है जो इंटरनेट कॉल को लोकल मोबाइल कॉल में बदल देता है।
चीन का नाम बार-बार क्यों आ रहा है?
कई बड़े साइबर ठगी नेटवर्क चीन से संचालित पाए गए हैं, जिनका भारत में लोकल सेटअप होता है।
क्या आम घर से SIM बॉक्स चल सकता है?
हां, छोटे किराए के मकान से भी यह सेटअप चलाया जा सकता है, जैसा गुरुग्राम केस में दिखा।
पुलिस इसे कैसे पकड़ सकती है?
तकनीकी ट्रेनिंग, टेलीकॉम डेटा की समझ और DoT के साथ बेहतर समन्वय से।








