AI दुरुपयोग पर पीएम मोदी ने जोहान्सबर्ग में आयोजित G20 शिखर सम्मेलन में विस्तार से चर्चा की। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि एआई का उपयोग आतंकवाद, अपराध और डीपफेक्स जैसी हानिकारक गतिविधियों के लिए अगल-थलग नहीं छोड़ा जा सकता। उनका आह्वान एक “Global Compact” बनाने का है — एक अन्तरराष्ट्रीय रूपरेखा जो एआई के जिम्मेदार उपयोग और इसके दुरुपयोग पर सख्त नियंत्रण सुनिश्चित करे।
AI दुरुपयोग पर पीएम मोदी
एआई का आतंकवाद और अपराध के लिए इस्तेमाल होना स्वीकार्य नहीं।
एक अंतरराष्ट्रीय “Global Compact” की आवश्यकता, जो एआई के उपयोग के लिए साझा नियम, पारदर्शिता मानक और जवाबदेही के तंत्र निर्धारित करे।
तकनीक मानवता के लिए हो; उसे समाजों को अस्थिर करने के लिए नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
G20 में पीएम मोदी का दो टूक संदेश: AI का दायरा और ‘रेड लाइन’
एआई, विशेषकर डीपफेक टेक्नोलॉजी और बड़े भाषा मॉडल, सूचना-परिसंचरण के तरीके बदल रहे हैं। जबकि ये उपकरण सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं, उनका गलत इस्तेमाल बहुआयामी जोखिम पैदा कर सकता है:
- भ्रामक सूचना और प्रोपेगेंडा: अत्यंत वास्तविक दिखने वाले नकली वीडियो और ऑडियो जनमत को प्रभावित कर सकते हैं और चुनावी प्रक्रियाओं को कमजोर कर सकते हैं।
- धोखाधड़ी और आर्थिक नुकसान: नकली आवाज़ या वीडियो का इस्तेमाल करके लोग आर्थिक धोखाधड़ी का शिकार हो रहे हैं।
- विश्वास का क्षरण: मीडिया और सार्वजनिक संस्थाओं पर विश्वास घटता है जब लोग सत्य को नापसंद या शंका के साथ देखते हैं।
- सामाजिक अशांति: झूठी खबरें साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा को भड़काने में भूमिका निभा सकती हैं।
- व्यक्तिगत उत्पीड़न: डीपफेक्स का इस्तेमाल बदनामी, ब्लैकमेल और मानसिक उत्पीड़न के लिए होता है।
आतंकवादी मॉड्यूल में एआई का उपयोग — वास्तविक खतरे
एआई का इस्तेमाल केवल प्रोपेगेंडा तक सिमित नहीं है। आतंकवादी और उग्रवादी समूह कई मायनों में एआई का लाभ उठा सकते हैं:
- परिष्कृत प्रचार सामग्री: अधिक प्रभावशाली, भावनात्मक रूप से लक्षित और वास्तविक दिखने वाले सामग्री के जरिए भर्ती बढ़ाना।
- भर्ती और कट्टरपंथीकरण: लक्षित संदेशों के माध्यम से कमजोर वर्गों का भेदभाव कर उन्हें कट्टरता की ओर मोड़ा जा सकता है।
- ऑपरेशनल प्लानिंग: बड़े भाषा मॉडल रणनीति और संचालन की रूपरेखा तैयार करने में दुष्प्रयोग के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं।
- साइबर हमले और फ़िशिंग: स्वचालित स्पीफ़ियरिंग, मैलवेयर जेनरेशन और फ़िशिंग संदेशों का पैमाना बढ़ सकता है।
- युद्धक्षेत्र भ्रम: नकली छवियों/वीडियो से संघर्ष की तस्वीर बदली जा सकती है और मानवीय सहायताओं को प्रभावित किया जा सकता है।
- जरुर पढ़ेंः AI ने बदला साइबर क्राइम का हर रुप, जानिए कैसे
क्या किया जाना चाहिए — नीतिगत और तकनीकी सुझाव
- वैश्विक समझौता (Global Compact): एक बहुपक्षीय फ्रेमवर्क जिसमें प्रयोग के नियम, डेटा सुरक्षा मानक और एआई उपकरणों के प्रमाणन की प्रक्रिया शामिल हो।
- डीपफेक डिटेक्शन और लेबलिंग: जनसरोवर सामग्री पर स्पष्ट लेबलिंग/वैरिफिकेशन आवश्यक हो; प्लैटफ़ॉर्म पर त्वरित पहचान तंत्र।
- कठोर आपराधिक नियम: आतंकवाद और बड़े पैमाने की धोखाधड़ी में एआई के उपयोग पर सख्त दंडात्मक प्रावधान।
- पारदर्शिता और ऑडिट ट्रेल्स: बड़े मॉडल और सामग्री जेनरेटर्स के लिए ऑडिट लॉग और मॉडल कार्ड अनिवार्य होने चाहिए।
- तकनीकी निवेश: डिटेक्शन टूल्स, वैरिफिकेशन फ़्रेमवर्क और डिजिटल साक्ष्य-संग्रह प्रणाली में निवेश।
- जन जागरूकता और शिक्षा: नागरिकों को डीपफेक पहचानने और संदिग्ध सामग्री रिपोर्ट करने के लिए शिक्षित करें।
- अंतर-संस्थागत सहयोग: न्यायपालिका, टेक उद्योग और नागरिक समाज के बीच समन्वय।
भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका
भारत जैसे लोकतंत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण है कि वे नीतिगत पहल और तकनीकी विकास दोनों में संतुलन रखें। पीएम मोदी का प्रस्ताव इस दिशा में एक स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत है — जो वैश्विक साझेदारी, क्षमता निर्माण और नियमों के निर्धारण को आगे बढ़ाने में सहायक होगा।
संभावित चुनौतियाँ
- तकनीकी परिवर्तन की तेज़ रफ्तार के कारण नियमों का लगातार अद्यतन ज़रूरी होगा।
- वैश्विक सहमति बनाना जटिल है क्योंकि विभिन्न देशों की नीतिगत प्राथमिकताएँ अलग हो सकती हैं।
- निजता और नवाचार के बीच संतुलन रखना चुनौतीपूर्ण रहेगा।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री मोदी का जोहानेसबर्ग संबोधन एआई के दुरुपयोग पर वैश्विक चेतावनी और सहयोग की पुकार दोनों है। डीपफेक्स और एआई-आधारित आतंकवादी गतिविधियाँ वास्तविक और तत्काल जोखिम हैं। एक पारदर्शी, जवाबदेह और नियमन-समर्थ वैश्विक समझौता न सिर्फ़ आवश्यक है, बल्कि समय की मांग है।
कॉल-टू-एक्शन (CTA)
यदि आप इस मुद्दे के बारे में जागरूकता बढ़ाना चाहते हैं, तो इसे साझा करें और सोशल मीडिया/पब्लिक प्लेटफॉर्म पर संदिग्ध सामग्री की रिपोर्ट करने के सरकारी उपायों के बारे में लोगों को बताइए। नीति निर्माताओं से भी आग्रह करें कि वे पारदर्शिता और सुरक्षा-आधारित एआई नीतियों को प्राथमिकता दें।
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