कोई पावर सेंटर नहीं पर पांव छूते हैं पुलिसवाले

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ये कोई नई बात नहीं है कई बार खबरों में ये देखा, सुना पढ़ा जाता है कि पुलिस अधिकारी ने फलां मंत्री अधिकारी या पावर के पैर छूए। मगर झारखंड के धनबाद में पुलिस अधिकारी जिस शख्स के पैर छूने या सानिध्य पाने जाते हैं वो ना तो मंत्री है ना ही साधु और ना ही किसी पावर का सेंटर। कोयला-कारोबार और कोल माफिया के लिए बदनाम धनबाद के एक जर्जर से मकान में रहने वाला ये व्यक्ति कोई माफिया भी नहीं जिसका खौफ हो। ये सत्य दास्तान एक ऐसे शख्स की है जो 79 साल का बुजुर्ग है। नाम है सत्य नारायण सिंह। उनके पास ना तो पैसा है ना ही पावर मगर संबंध है ईमानदारी मेहनत और कामयाबी से।
सत्य नारायण सिंह झारखंड के डीएसपी पद से रिटायर्ड हैं और आजकल निजी कंपनी में मैनेजर के पद पर काम करते हैं।

 retired dsp of jharkhad
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इनके पांव छूने पहुंचने वाले अधिकारियों का कहना है कि उनके जीवन का हर संघर्ष हजारों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है। 30 जून 1938 को जन्मे सत्य नारायण सिंह के पिता बृज बिहारी सिंह सेना में सिपाही थे, उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध में दुबई बगदाद और ईरान में लड़ाई में हिस्सा लिया और युद्ध समाप्त होने के बाद उन्हें बिहार सरकार में नौकरी मिली। लेकिन 1950 में उनकी सेवा निवृति के बाद घर की माली हालत कमजोर होती चली गई।
दो भाईयों में छोटे सत्यनारायण पर भी बोझ पड़ा। इस जिम्मेवारी को निभाने के लिए 13 साल का सत्यनारायण पिता संग मुजफ्फरपुर में सब्जी बेचने लगा। जैसे तैसे घर का गुजारा चल रहा था। सुबह 9 बजे तक सब्जी बेच कर 10 बजे स्कूल जाना और फिर लौट कर सब्जी बेच सत्यनारायण शनिवार को दोपहर में स्कूल से छुट्टी होने पर दूसरे हर जाकर सब्जी बेच कर रविवार की शाम वापस लौटजाते ताकि सोमवार को स्कूल ना छूटे। पढ़ाई का उन्हें बहुत शौक था ।

सब्जी बेच कर कमाए गए पैसो से वो अपना और परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक करने की कोशिश करते। बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने 18 साल की उम्र में एक ठेकेदार के यहाँ मुंशी का काम शुरू किया। वेतन मिलते थे 20 रुपए और इसी में से बचकर उन्होंने 1955 में अपनी बहन की शादी में मदद की। शिक्षा में बाधा न आये इसके लिए उन्होंने ट्रैन में सफाई का काम भी शुरू कर दिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात अपने गुरु रिजवी जी से हुई । सत्यनरायन के संघर्ष से प्रभावित रिजवी जी ने तत्कालीन एसपी जगदानन्द से कहके उन्हें टाइपराइटर की नौकरी दिलवा दी। वे सुबह टाइप करते और शाम को गरीब बच्चो को मुफ्त शिक्ष देते । कड़ी मेहनत और लगन की बदौलत 1966 में उन्हें बिहार पुलिस में दरोगा की नौकरी मिली।
पुलिसिया नौकरी के दरम्यान सत्यनरायन को बड़ी मुश्किलो का सामना करना पड़ा। 40 साल की उम्र में ही उन्हें शुगर और ब्लडप्रेशर जैसे रोगों ने घेर लिया। लेकिन कठिन परिश्रम और मेहनत के आगे बीमारियों ने भी हार मान लिया। वो सुबह 4 बजे उठते है योग करते है और मिलने वालों को संतोष और आत्मविस्वास को सबसे बड़ी पूंजी बनाने की सलाह देते है। पूजा के स्थान पर उन्होंने गुरु रिजवी जी की तस्वीर लगा रखी है। इस्लामिक धर्म के रिजवी जी की तस्वीर हिन्दू धर्मस्थल पर लगना अपने आप में मिसाल है। पूरी नौकरी में सरकारी धन का कभी इस्तेमाल न करने वाले सत्यंनारायण के विचारों को मानने और उनके सानिध्य को भगवान का सानिध्य मानने वाले बिहार के आईपीएस एस के भरद्वज कहते है कि सत्यनारायण जैसे संघर्षशील और कर्तव्यनिष्ठ कोई और नही हो सकता। बिहार निगरानी में तैनात डीएसपी विनय कुमार सिंह के मुताबिके भ्रष्टाचारियों के पसीने छूट जाते थे।

सत्यनारायण आज भी कमाए पैसो को 3 हिस्सो में करते है 1 हिस्सा खुद दूसरा परिवार और 3रा गरीबो का होता है।

आयुष मल, पटना

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